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Kraanti Bhagat

Kraanti Bhagat

Author: Priyanka Upadhyay

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Original price was: ₹199.Current price is: ₹179.

Short Description

कथाकार ने आज के भारत में गुलाम भारत के आजादी की भावना और उसको पाने की पीड़ा, संघर्ष और त्याग के अहसास को आम जन को स्पर्श कराने का एक छोटा सा प्रयास किया है इस लघु कथा के माध्यम से। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल बड़े शहरों, सभाओं और नेताओं तक सीमित नहीं थी। उसकी असली धड़कन उन अनगिनत गाँवों में बसती थी, जहाँ मिट्टी की सोंधी गंध के साथ आज़ादी का सपना पलता था। यह कहानी ऐसे ही एक गाँव की है जहाँ खेतों में हल चलता था, मंदिर की घंटियों और मस्जिद की अज़ान के बीच जीवन आगे बढ़ता था, और जहाँ अंग्रेज़ी हुकूमत की छाया हर सांस पर महसूस की जाती थी।

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Original price was: ₹199.Current price is: ₹179.

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Page Count

37

Book Type

Paperback

ISBN

978-93-6402-358-0

Mrp

199

Genre

Story

Language

Hindi

About the Book

कथाकार ने आज के भारत में गुलाम भारत के आजादी की भावना और उसको पाने की पीड़ा, संघर्ष और त्याग के अहसास को आम जन को स्पर्श कराने का एक छोटा सा प्रयास किया है इस लघु कथा के माध्यम से। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल बड़े शहरों, सभाओं और नेताओं तक सीमित नहीं थी। उसकी असली धड़कन उन अनगिनत गाँवों में बसती थी, जहाँ मिट्टी की सोंधी गंध के साथ आज़ादी का सपना पलता था। यह कहानी ऐसे ही एक गाँव की है जहाँ खेतों में हल चलता था, मंदिर की घंटियों और मस्जिद की अज़ान के बीच जीवन आगे बढ़ता था, और जहाँ अंग्रेज़ी हुकूमत की छाया हर सांस पर महसूस की जाती थी। जब देश की आज़ादी की लड़ाई अपने निर्णायक मोड़ पर थी, तब यह छोटा-सा गाँव भी उस उथल-पुथल से अछूता नहीं रहा। इस गाँव में किसान, स्त्रियाँ, बच्चे, बुजुर्ग सभी अपने-अपने हिस्से का संघर्ष जी रहे थे। कहीं भय था, कहीं असमंजस, तो कहीं चुपचाप पनपता साहस। जाति, वर्ग और लिंग के भेदों के बीच भी मानवीय रिश्ते थे, जो अन्याय के विरुद्ध एक-दूसरे का हाथ थामना सिखाते थे। यह कथा उन गुमनाम लोगों की है, जिन्होंने बिना इतिहास की किताबों में नाम दर्ज कराए, आज़ादी की नींव मजबूत की। अंग्रेज़ी नीतियों का दबाव, आर्थिक शोषण, और सामाजिक असमानताएँ गाँव के जनजीवन को भीतर तक झकझोर रही थीं। ऐसे समय में कुछ साधारण लोग असाधारण निर्णय लेते हैं-कभी डर के बावजूद सच का साथ देने का, तो कभी चुप रहकर भी प्रतिरोध करने का। यह कहानी केवल राजनीतिक संघर्ष की नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की है-स्त्रियों की मौन शक्ति, युवाओं की बेचैनी, बुजुर्गों की स्मृतियाँ और बच्चों की मासूम उम्मीदें। इसमें अहिंसा और साहस, एकता और मतभेद, तथा त्याग और आत्मसम्मान जैसे मूल्यों की झलक मिलती है। यह पुस्तक याद दिलाती है कि आज़ादी किसी एक दिन या एक व्यक्ति की देन नहीं थी, बल्कि उन अनगिनत गाँवों की सामूहिक चेतना का परिणाम थी, जिन्होंने इतिहास को चुपचाप दिशा दी।

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