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Kaagaz Ke Manush

Kaagaz Ke Manush

Author : Shaktiman Mishra

Book Cost

Original price was: ₹229.Current price is: ₹209.

Short Description

“काग़ज़ के मानुष” ५१ अलग-अलग अनुभूतियों का एक ऐसा साहित्यिक कोलाज है, जो मानव जीवन के हर एक पहलू को गहराई से छूता है। यह पुस्तक किसी एक नायक या नायिका के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, क्योंकि यहाँ का असली नायक समाज की हकीकत और इंसान का आंतरिक संघर्ष है।

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Original price was: ₹229.Current price is: ₹209.

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Page Count

108

Book Type

Paperback

ISBN

9789364022347

Mrp

229

Genre

Novel

Language

Hindi

About the Book

“काग़ज़ के मानुष” ५१ अलग-अलग अनुभूतियों का एक ऐसा साहित्यिक कोलाज है, जो मानव जीवन के हर एक पहलू को गहराई से छूता है। यह पुस्तक किसी एक नायक या नायिका के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, क्योंकि यहाँ का असली नायक समाज की हकीकत और इंसान का आंतरिक संघर्ष है। मध्यम वर्ग के दैनिक द्वंद्व से लेकर श्मशान के अंतिम वैराग्य तक, हर एक ‘काग़ज़’ पाठक को जीवन की नग्न सचाई से रूबरू कराता है। यह पुस्तक कहानी विहीन होकर भी जिंदगी की सबसे बड़ी कहानी कहती है।

About the Author

शक्तिमान मिश्रा हिन्दी साहित्य की आधुनिक विचार-धारा के एक संवेदनशील काव्यकार, भावात्मक लेखक और सामाजिक चिंतक हैं। मूलतः उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के केराकत तहसील से ताल्लुक रखने वाले शक्तिमान वर्तमान में मुंबई के महानगरीय परिवेश में रहकर समाज और इंसानी मन के भीतर छिपे अंतर्द्वंद्वों को शब्द दे रहे हैं। बचपन से ही साहित्य, कला और सामाजिक चेतना के प्रति गहरा झुकाव रखने के कारण, उनकी लेखन शैली में पुराने दौर की साहित्यिक गहराई और आज के बदलते दौर की वास्तविकताओं का एक अनूठा और मर्मस्पर्शी समन्वय दिखाई देता है। उनकी लेखनी की यात्रा का पहला मुख्य पड़ाव उनकी बहुचर्चित पहली काव्य-कृति “अनहद — जो कभी ना टूटा” के रूप में सामने आया, जिसने अपनी भावात्मक गहराई और अनकहे विचारों को दी गई जुबां के कारण पाठकों के दिलों में एक विशिष्ट स्थान बनाया। अपनी पहली पुस्तक की सफलता के बाद, अपनी इसी साहित्यिक यात्रा को और अधिक परिपक्वता देते हुए वे अपनी इस दूसरी कृति “काग़ज़ के मानुष” के साथ पाठकों के सम्मुख हैं। जहाँ “अनहद” मन की आंतरिक परतों और अनुभूतियों को छूती थी, वहीं “काग़ज़ के मानुष” आज के दिखावटी, खोखले और संवेदनहीन होते जा रहे समाज के सामने एक बेबाक मानवीय दर्पण रखती है। एक लेखक और सामाजिक सजगता के प्रहरी के रूप में, शक्तिमान का अटूट विश्वास है कि साहित्य का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि पाठक के भीतर सोई हुई संवेदनाओं को झकझोरना है। वे मध्यम वर्ग के दैनिक संघर्षों, जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे पुरुषों और स्त्रियों की चुप्पी, और नई पीढ़ी के मानसिक भटकाव व अकेलेपन को बेहद बारीकी से समझते हैं। उनकी यह कृति इस बात का जीवंत प्रमाण है कि वे केवल एक लेखक नहीं हैं, बल्कि समाज की हर छोटी-बड़ी करवट को भीतर तक महसूस करने वाले एक राही हैं। उनकी भाषा सरल, गंभीर और आत्मीय है, जो पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि यह किताब किसी अजनबी ने नहीं, बल्कि खुद उनके अपने जीवन की खामोशियों ने लिखी है।

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