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Chhat Vale Kamre Ka ‘Main’

Chhat Vale Kamre Ka ‘Main’

Author: Bhavesh Garg

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Original price was: ₹249.Current price is: ₹229.

Short Description

यह पुस्तक “छत वाले कमरे का ‘मैं’” आधुनिक युवाओं की उस भीतरी यात्रा को अभिव्यक्त करती है, जहाँ जीवन की भीड़ में खोया हुआ ‘मैं’ अपने अस्तित्व की तलाश करता है। यह कहानी एक छोटे से कमरे, कुछ अधूरी बातों, रिश्तों की धूल और आत्ममंथन के पलों में आकार लेती है।

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Page Count

144

Book Type

Paperback

ISBN

978-93-6402-864-6

Mrp

249

Genre

Novel

Language

Hindi

About the Book

यह पुस्तक “छत वाले कमरे का ‘मैं’” आधुनिक युवाओं की उस भीतरी यात्रा को अभिव्यक्त करती है, जहाँ जीवन की भीड़ में खोया हुआ ‘मैं’ अपने अस्तित्व की तलाश करता है। यह कहानी एक छोटे से कमरे, कुछ अधूरी बातों, रिश्तों की धूल और आत्ममंथन के पलों में आकार लेती है। भावेश गर्ग की यह रचना आत्मस्वीकृति, अकेलेपन और आत्मसंवाद का भावनात्मक मिश्रण है। यहाँ लेखक अपने भीतर के प्रश्नों, समाज की जटिलताओं और मानवता की संवेदना से जूझते हुए पाठक को भी सोचने पर मजबूर करता है। यह सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि हर उस ‘मैं’ की दास्तान है जो भीतर से जागना चाहता है।

About the Author

भावेश गर्ग, महवा (राजस्थान) के एक छोटे से कस्बे से आने वाले युवा लेखक हैं, इन्होंने कृषि विज्ञान में स्नातक किया है, लेकिन हिंदी साहित्य में शुरुआत से ही अधिक रुचि होने के कारण ये इस समय महात्मा गांधी महाविद्यालय महवा से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। भावेश गर्ग उन अनकहे भावों के लेखक हैं, जो अक्सर चुप्पी में पलते हैं। बीते कुछ वर्षों से वह अपनी डायरी में हर उस भावना को दर्ज करते आए हैं जिसे वे शब्दों से ज़्यादा महसूस करते हैं , प्रेम, दोस्ती, आत्मसंवाद, और उस ‘कुछ’ की तलाश जो कभी उनका था, अब सिर्फ़ स्मृति है। इन्होंने हाल ही में एक ऑटोफिक्शन पुस्तक पर काम पूरा किया है, जिसमें उनका ‘मैं’ कई परतों में खुलता है। यह उनकी पहली पुस्तक है, जो न केवल कथा है, बल्कि आत्मा की यात्रा है। एक ‘मैं’ से दूसरे ‘मैं’ तक का मौन और जटिल रास्ता। ” छत वाले कमरे का ‘मैं’ ” उनकी पहली किताब है, यह किताब एक कमरे से नहीं निकली, उसी कमरे में जिया गया जीवन है, जहां अकेलापन कभी दुश्मन नहीं, एक साथी था, जहां भावनाएं कभी सरल तो कभी उलझी हुई मिलती हैं। वे मानते हैं कि हर लेखक पहले खुद से मिलता है, फिर दुनिया से। भावेश का लेखन न ज़्यादा सजावटी है, न पूरी तरह सादा, वह कभी सरल बहता है, तो कभी उलझनों में ठहर जाता है। भावेश को न किसी मंच की लालसा है, न किसी पुरस्कार की चाह वे लिखते हैं क्योंकि शब्दों में ही उन्हें खुद से मुलाक़ात होती है, और यही वे चाहते हैं । भावेश का मानना है कि कहानियाँ सिर्फ कहने के लिए नहीं होतीं, बल्कि वे जीने का एक सलीका बन जाती हैं।

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