राजेन्द्र सिंह जादौन मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक और कलात्मक भूमि में जन्मे एक ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी पहचान वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार कवि और कलात्मक छायाकार के रूप में स्थापित है। उनकी रचनात्मक यात्रा पत्रकारिता से प्रारंभ होकर कविता और व्यंग्य तक फैली है। शब्दों के इस सफ़र में उन्होंने न केवल घटनाओं को दर्ज किया, बल्कि समाज की धड़कनों को भी सुना, महसूस किया और उन्हें अपनी विशिष्ट भाषा में व्यक्त किया।
पत्रकारिता ने जादौन जी को सत्य की सूक्ष्म पहचान और समाज की नब्ज़ को समझने की दृष्टि दी। यही दृष्टि उनकी कविताओं और व्यंग्य में दिखाई देती है। उनके शब्द कभी कोमल संवेदनाओं से भरे होते हैं, तो कभी सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करते हैं। वे बिना किसी भय या झिझक के समाज की विसंगतियों को उजागर करते हैं पर ऐसा करते समय उनका उद्देश्य आलोचना नहीं, बल्कि जागृति होता है।
उनकी कविताओं में जीवन का अनुभव, समय की पीड़ा और मानवीय भावनाओं की गहराई सहजता से घुली हुई मिलती है। वे जीवन के हर रंग को अपनी कविता में स्थान देते हैं प्रेम, संवेदना, विद्रोह, व्यंग्य और करुणा सब कुछ एक लय में बहता है। जादौन जी की रचनाएँ केवल भावनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का निमंत्रण हैं। पाठक जब उनकी कविता पढ़ता है, तो वह अपने भीतर झाँकने लगता है; कविता के पात्रों और स्थितियों में स्वयं को खोजने लगता है।
उनकी लेखनी का सबसे बड़ा गुण है सरलता में गहराई। वे जटिल विचारों को इतने सहज शब्दों में पिरोते हैं कि वह सीधे हृदय में उतर जाते हैं। यही सहजता और संवेदनशीलता उनकी कविताओं को आम पाठक के लिए भी सुलभ बनाती है और साहित्यिक दृष्टि से भी समृद्ध करती है।
जादौन जी का संकलन “एक फ़ितूर” इस रचनात्मक परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पुस्तक व्यंग्य और कविता का अद्भुत संगम है जहाँ शब्दों में हास्य है, पर भीतर गहरी वेदना भी छिपी है; जहाँ मुस्कुराहट के साथ सोचने की प्रेरणा है। “एक फ़ितूर” समाज के यथार्थ को उजागर करती हुई, पाठक को संवेदना, सत्य और आत्मबोध की यात्रा पर ले जाती है।
राजेन्द्र सिंह जादौन की लेखनी में एक पत्रकार की पैनी दृष्टि और एक कवि का कोमल हृदय एक साथ बोलता है। वे शब्दों से केवल दृश्य नहीं बनाते, बल्कि विचार जगाते हैं। उनका हर लेख और कविता समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और मानवीय संवेदना का प्रमाण है।
संक्षेप में कहा जाए तो राजेन्द्र सिंह जादौन न केवल शब्दों के साधक हैं, बल्कि संवेदना के संरक्षक भी हैं एक ऐसे लेखक, जो अपनी रचनाओं से समाज को आईना दिखाते हैं और पाठक को भीतर से झकझोर देते हैं। “एक फ़ितूर” उनकी इसी संवेदनशील और सार्थक रचनात्मकता का प्रमाण है, जो हिंदी साहित्य में एक स्थायी छाप छोड़ने वाली कृति के रूप में स्थापित होती है।