“यक़ीनन एक से बढ़कर एक हस्ती इस जहाँ में अपने निशाँ छोड़ गए हैं और हर छज्जे के नीचे खड़ी भीड़ को एक ऐतबार भी दे गए हैं। ऐतबार के वो भी भीड़ में थे, इस दुनिया जहान के छोटे छोटे शहरों में, पर आप रहे तो निशाँ रहे और निशाँ रहे तो आप रहे। मैं भी इक ऐसी ही भीड़ का हिस्सा हूँ, और कुछ ऐसी ही दिली तमन्ना हैं के मेरे दिल और दिमाग की बे-बखत हलचल को बटोर के समझ पाऊँ। मैं देख पाऊँ के मेरे ख़्याल दिखते कैसे हैं? भीड़ के हर इंसा को असमंजस हैं के दिल उतार के रखा जाए भी तो कैसे ? मुझे एक तरीका मिला और मैं लिखने लगा। इक मिस्रा’ से शुरू किया था और आज नज़्मों और ग़ज़लों में डूब रहा हूँ, कुछ आप लिखी, कुछ जहाँ लिखी।
कुछ उम्दा हस्तियों को पढ़ना शुरू किया तो यह वाकिया हुआ के रोने लगा, निहारने लगा, बटोरने लगा और सोचने लगा। कुछ ने कलम से जिगर उतार के ऐसा लिखा के आँख बिना ठेस के रोने लगी। कुछ इतना सुंदर पढ़ा के क़ाफिया निहार निहार के आँख ज़रा भी न थकी। आँखें लालची हो गई और यह सोचकर किताबें बटोरने लगी कि हस्तियां सब कुछ तो लिख चुकी हैं तो बाकी क्या हैं? बंद आँखों में जो सपने थे वो खुली आँखों ने चुरा लिए, आँखें सोचने लगी के ख़ार लिखूँ या शहद लिखूँ, जहर लिखूँ या पानी।
मैं ऐसा क्या ही लिखूँ के सैलाब बढ़े, मैं ऐसा क्या ही लिखूँ के आप पढ़े
वक्त दर वक्त कदर आसमान तक जा चुकी थी इन सभी हस्तियों के लिए जिन्होंने मुझे कलम की वर्णमाला से रुबरु करवाया। इन्हें पढ़ कर धमाका और दम-कशी एक साथ होने लगी। ज़िन्दगी थोड़ी और बेहतर लगने लगी और मालूम पड़ा के जिस भीड़ में अपने आप को देखता हूँ मैं, उस जैसी अनगिनत भीड़ में जिंदगी के हर दूसरे मोड में रहे थे सब, पर जिंदगी को देखते थे, जीते थे, समझते थे, और अपना दिल परोस के रख देते थे। ग़म हो, शिकवा हो, मोहब्बत हो, या नबी की सोहबत हो, हर वाक़िए को कागज़ पे ऐसे उतारने का हुनर के लोगों के आँसू कलेजे से बाहर आ जाए। इन सभी के हुनर का हमेशा कदर दान रहूँगा और इनकी लेखकी का एक रत्ती भर भी इस जिंदगी में कर पाया तो मैं सोचूंगा के मैं भी भीड़ से निकल पाया। हज़ारों हस्तियां हैं जिनको बारीकी से बयां करना चाहता हूँ के उनकी कलम ने मेरे भीतर कैसी अव्वल दर्जे की छाप छोड़ी हैं और शब्द भी बहुत हैं मेरे पास, पर मेरी पहली किताब में जिक्र कुछ उन पहली हस्तियों का जिन्हें पढ़कर मैंने सिखा और समझा के कलम चलाई कैसे जाती हैं। बाबा बुल्ले शाह, मीर तक़ी मीर, मिर्ज़ा ग़ालिब, फैज़ अहमद फैज़, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, जॉन एलिया, अहमद फ़राज़, बशीर बद्र, निदा फ़ाज़ली, आनंद बक्शी, गुलज़ार साहब, जावेद अख्तर, इरशाद कामिल और ऐसी कई सुंदर हस्तियों को, जिनका नाम भी लेने के काबिल नहीं समझता हूँ मैं खुद को, और शायद तक कभी मेरे जज़्बात इन सभी तक पहुंचे भी ना, बस इस किताब के जरिए ज़ाहिर करना चाहता हूँ के हमेशा इन सभी का आभारी रहूँगा। आज तक इन सभी ने मुझसे सिर्फ किताबों के ज़रिए ही बात की हैं और आज मेरी किताब के ज़रिए मैं भी इन सभी से बात करना चाहूंगा और इन सभी हस्तियों को कहना चाहूँगा के मैं आप सभी का हमेशा एहसानमंद रहूँगा।
वैसे देखा जाए तो किसी ने सीधा ही मेरे हाथ में किताब तो नहीं रखी थी, और जब किताब नहीं थी तब क्या था? संगीत था। जिस चाहत और लगन से मैंने संगीत की ज़ुस्तज़ू की हैं, अगर मैं खुदा ढूँढ़ता तो शायद मिल भी जाता। या मुझे खुदा मिल गया हैं, बस संगीत का रूप लेकर मेरे दिल में बसर कर बैठा हैं। जब गानों का चस्का लगा तो यह भी लत लगी के यह आवाज़ हैं किसकी? यह भी जानने की इच्छा हुई के यह बोल लिखे किसने हैं? आरज़ू और बढ़ी तो यह भी पता करने लगा के संगीतकार कौन हैं? और धीरे धारे कलम और संगीत मेरे इतने खास हो गए के उनसे बेहतर आज तक कुछ नहीं लगा। और अब बहुत देर हो चुकी हैं, संगीत मेरा हिस्सा बन चुका हैं। अब संगीत और मेरा साथ तब ही छूटेगा जब इस भीड़-भाड़ भरी दुनिया में मेरा आखिरी पल होगा, या शायद नहीं? मासूम सा इंसानी दिल हैं मेरा और दिली तमन्नाएं कुछ और भी हैं, के कुछ ऐसे गीत लिख दूँ, कुछ ऐसा संगीत बना दूँ जो मेरे जाने के बाद भी रहे तो मैं भी कह सकू के मेरे भी निशाँ जिंदा हैं। संगीत की दुनिया अपने आप में ही एक बहुत बहुत बड़ी दुनिया हैं और ऐसे कुछ हस्ती जिनके संगीत ने मुझको संगीत के सातों सुरो की परख करवाई उनका नाम न लेना गुस्ताखी होगी। मुझे बहुत सहमा सहमा सा लग रहा हैं क्योंकि मेरे दिमाग में हज़ारों नाम आ रहे हैं और मेरा बस चले तो मैं पूरा जगत उतर के रख दूँ पर मुमकिन तो नहीं। इसलिए मेरे दिल के एक छोटे से हिस्से में घर कर रखे कुछ हस्तियों का नाम लिए बगैर मैं इस किताब को कैसे शुरू कर सकता हूँ। लता मंगेशकर, के.एस. चित्रा, नूर जहां, शमशाद बेगम, आशा भोंसले, फरीदा खानुम, ऊषा उथुप, आबिदा परवीन, अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति, मधुश्री, साधना सरगम, कौशिकी चक्रवर्ती, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान, रेखा भारद्वाज, शिल्पा राव, उस्ताद मेहदी हसन साहब, उस्ताद गुलाम अली साहब, उस्ताद नुसरत फतह अली खान, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे, मुकेश, कुमार सानू, उदित नारायण, ऐस पी बालासुब्रह्मण्यम, सोनू निगम, शान, केके, मोहित चौहान, सुखविंदर सिंह, शंकर महादेवन, हरिहरन, आतिफ असलम, जावेद अली, शहीद माल्या, अरिजीत सिंह, अली सेठी, एस डी बर्मन, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, आर डी बर्मन, लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल, कल्याणजी आनंदजी, बप्पी लाहिरी, नदीम श्रवण, जतिन ललित, ए आर रहमान, प्रीतम दा, शंकर एहसान लॉय, संजय लीला भंसाली, विशाल
भारद्वाज, अमित त्रिवेदी, अजय अतुल, विशाल शेखर, सचिन जिगर, सलीम सुलेमान, अमिताभ भट्टाचार्य, एडेल और ऐसे कई सारे हस्तियों का कदरदान रहूँगा।
बस यहीं हैं मेरी पहली किताब। कलम और संगीत से तुक मिलाती हुई, मेरे सीने को कभी छलनी कभी शीशम करती हुई। मेरे इर्द गिर्द के किस्से, लोग, शहर के वाक़िए और कुछ दिल की गहरी सहमी यादें। यह सब आम और खास जनता, नबी के दुलारे हैं। नबी के शहर के लोग हैं, और मेरी यह मासूम किताब इन्हीं के किस्से और कहानियों को परोसती हुई एक छोटी सी पहली कोशिश हैं – तेरे शहर के लोग।
भूल चुक माफ़।
“