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सूर्मि

विशाल प्रजापति

दुष्यंत कुमार और शकुंतला के पुत्र, महान राजा भरत के नाम से विख्यात इस भारत वर्ष के नामकरण का इतिहास जितना पुराना है उतने पुराने तो इस दुनिया के आधे से अधिक देश भी नहीं। देश के इस अपरिमेय, विशाल इतिहास के पीछे जो कारण है, वो है अध्यात्म और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत। 

लेखक परिचय

पाठकों के दृष्टिकोण से मेरा का परिचय केवल मेरे द्वारा लिखी गई पुस्तकें हैं। कई अप्रकाशित कविताओं के पश्चात मैंने अपने पहले उपन्यास ‘अनाम: तुम याद आते हो’ (Self Publish on Amazon Kindle) को जून 2020 में अंतिम आकार दिया। जिसमें प्रेम की वास्तविक परिभाषा को, जो अश्लीलता की परछाई से भी अछूती है, से पाठकों को परिचित करवाने का प्रयास किया गया है।

अनाम के बाद ‘सूर्मि’ मेरा का दूसरा उपन्यास है जो क्राइम, सस्पेंस, थ्रीलर विधा में लिखा गया है।

लेखक मध्यप्रदेश के गुना जिले के कुम्भराज शहर के निवासी हैं और पेशे से वरिष्ठ उपचार पर्यवेक्षक के पद पर कार्यरत हैं तथा पिछले कई वर्षों से शासकीय सेवक के तौर पर स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

लेखक के पिता श्री हरिप्रसाद जी शिक्षक हैं और साहित्य प्रेमी भी। पिताजी के साहित्य संग्रह को पढ़ते हुए ही मेरे अंदर साहित्य लेखन की कला का सृजन हुआ और मैंने ने 14 वर्ष की उम्र में ही उपन्यास लिखने का निश्चय कर लिया।

अपनी उच्च शिक्षा के दौरान मुझे और भी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय लेखकों को पढ़ने का सौभाग्य मिला जिससे मेरे अंदर साहित्य लेखन की भावना और अधिक बलवती हुई। मेरे के ऊपर सर्वाधिक प्रभाव श्रीरामचरितमानस का पड़ा और मैं मानस को ही अपने जीवन का पथ प्रदर्शक मानता हूँ।

लेखन के अतिरिक्त मुझे रियल लाइफ फोटोग्राफी करने, हारमोनियम बजाने, स्केचिंग करने और अन्य कई रचनात्मक कार्य करने के भी शोक हैं।

पुस्तक के बारे में

दुष्यंत कुमार और शकुंतला के पुत्र, महान राजा भरत के नाम से विख्यात इस भारत वर्ष के नामकरण का इतिहास जितना पुराना है उतने पुराने तो इस दुनिया के आधे से अधिक देश भी नहीं। देश के इस अपरिमेय, विशाल इतिहास के पीछे जो कारण है, वो है अध्यात्म और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत। विदेशी आक्रांताओं, मुगलों और अंग्रेजी शासन के असहनीय अत्याचार भी भारत की इस समृद्धशाली संस्कृति के विशाल वृक्ष को उखाड़ना तो दूर इसकी जड़ों को भी न हिला सके; हाँ वे इस विशाल वृक्ष की कुछ शाखाओं को अलग करने में (धर्मान्तरण के रूप में) अवश्य सफल रहे। किन्तु इस बार इस सांस्कृतिक वृक्ष में आधुनिकीकरण के नाम पर नग्नता और अपनी ही संस्कृति के पुरजोर विरोध की ऐसी घुन लगी है जो इस वृक्ष को अंदर से खोखला कर रही है। बाहर से सामान्य और फलित दिखने वाला ये सांस्कृतिक वृक्ष अंदर से शनै-शनै जर्ज़र होता जा रहा है। सांस्कृतिक वृक्ष पर ये अंदरुनी आक्रमण किसी विशेष योजना का क्रियान्वयन है अथवा कुछ और! या फिर ये देश के नागरिकों की मूर्खता मात्र है ये तो ईश्वर ही जाने परन्तु इसके परिणाम भयावह हैं। किसी महापुरुष ने कहा भी है कि ‘किसी राष्ट्र को समाप्त करना हो तो उसकी संस्कृति को नष्ट कर दो राष्ट्र स्वयं समाप्त हो जाएगा।’ इस पुस्तक में सरल कहानी के माध्यम से आधुनिकता के नाम पर की जा रही जिस फूहड़ता के ऊपर प्रकाश डाला जा रहा है वो दृश्य तो देश के हर गांव हर शहर में सहज रूप में ही दृष्टव्य है; किन्तु इसके गंभीर परिणाम नहीं। लेखक का प्रयास है इस नग्नता, इस फूहड़ता और इस कुप्रथा के विनाश कारी परिणामों से पाठको को परिचित करवाना।

पुस्तक इन माध्यमों से खरीदने के लिए उपलब्ध है

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